I wrote this poem in Hindi. A translation for my non-Hindi-speaking friends is coming soon
जीवन की दुपहरी! – ना जाने क्या है शिखर के उस पार!
तीसरा और चौथा पहर अभी शेष है
जगमगाती दुपहरी का ये भेष है
सूर्य अपने चरम पर
आशाएं अपने परचम पर
असली जीवन तो अभी बाकी है!
क्या पहुँच पाऊँगा अपने शिखर पर?
सूर्यास्त से भय कैसा
चंद्रमा तो शीतल है
और चौथे पहर के बाद एक सुंदर कल है
यही तो बस एक क्षण है
आज ही का बस जीवन है
दोपहर हो गई गंतव्य का पता नहीं
धूप से उत्साह में कोई कमी नहीं
पहले पहर जब निकले थे
आभास नहीं था कि इतना दूर पहुँच जाएंगे
दूसरे पहर में, कुछ नए मार्ग खुले हैं
कुछ नए साथी मिले हैं
कुछ नए पुष्प खिले हैं
जीवन मार्ग बहुत सुखद है
मिलकर एक बागीचा बनायें
जीवन रस को चहूं और पहुंचाएं
शिखर की अभिलाषा त्याग बस आगे बढ़ते जाएं
ना जाने क्या है शिखर के उस पार!
Wishing a great new year!

ery touchy poem ! Isme jijivisha hai aur hai joojhane kee prerna !!
सुंदर, सरल और प्रेरक कविता।
अपने मनोभावों को कविता का आकार देना बखूबी जानते हैं आप। शुरुआती पंक्तियों के बाद मुझे लगा कि शिखर की चाह को समर्पित न हो जाएं आपके शब्द ….
मगर आखिर तक पहुंचते-पहुंचते सच्चे मुसाफिर का रूप तसल्ली दे गया। इन्सान को इसी रूप में सबसे ज्यादा पसंद करता हूं मैं। राही….चलता चल…
शिखर तो एक छलावा है…एवरेस्ट सिर्फ बहलावा है…
सफर की उपलब्धियां , खुशियों के क्षण अनंत हैं, साझा करने के लिए मित्र-परिजन हैं …शिखर पर ये सब नहीं होते साथ….सिर्फ होते हैं आप…
अकेलापन भी कभी उपलब्धि हो सकता है ?
शुक्रिया , अपनी रचना हमसे साझा करने के लिए…
मामाश्री को भी शुक्रिया
सूर्यास्त से भय कैसा
चंद्रमा तो शीतल है
और चौथे पहर के बाद एक सुंदर कल है
सुन्दर है ये पंक्तियाँ !!